Sunday, August 3, 2014

नेहरू, गांधी से अलग राष्ट्रीय प्रतीक क्यों गढ़ना चाहते हैं मोदी?

-राहुल सिंह-
मोदी सरकार के पहले बजट की कुल मिला कर इस बार तारीफ ही हुई है. लेकिन इस बजट के जिस एक बिंदु पर पत्रकारों, विशेषज्ञों  व बुद्धिजीवियों ने आपत्ति जतायी वह है गुजरात सरकार को राज्य में बनने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रस्तावित स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के लिए 200 करोड़ रुपये की सहायता देने का. गुजरात सरकार (मोदी के सीएम रहते) के इस कार्यक्रम के लिए मोदी के खास सिपहसलार वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने पहले बजट में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम के लिए किये गये बजट आवंटन की दोगुणी राशि दीहै.

चर्चित पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने बजट भाषण जारी रहने के दौरान ही इस पर ट्विट कर चुटकी ली कि बेटी बचाने के लिए 100 करोड़ और स्टेच्यू के लिए 200 करोड़! स्वाभाविक है मोदी अपने संकल्प के अनुरूप अमेरिका के स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से ऊंची सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने के सपने को सच करने के लिए अगले बजटों में भी आवंटन करायेंगे.

मोदी की कार्यशैली बताती रही है कि उनके फैसले उनके आलोचकों के बयानों से प्रभावित नहीं होते, बल्कि उसके उलट वे अपने फैसले के प्रति और अधिक दृढ़ दिखने लगते हैं. जाहिर है वेदेश के प्रधानमंत्री के रूप में और सरदार पटेल को एक प्रकार से अपना आदर्श मानने का बार-बार संकेत देने के कारण इस प्रतिमा के निर्माण के स्वप्न को और दृढ़ता से सच करेंगे.

सवाल उठता है कि आखिर इसकी जरूरत क्यों है? मोदी इसके माध्यम से क्या साबित करना चाहते हैं? क्या मोदी नये राष्ट्रीय प्रतीक गढ़ना चाहते हैं,जो गांधी-नेहरू से अलग और कहीं अधिक दृढ़ दिखे? या फिर वे खुद का अक्स पटेल में देखने के कारण ऐसा करना चाहते हैं? दरअसल मोदी के राजनीतिक गुरु व संरक्षक रहे लालकृष्ण आडवाणी भी हमेशा अपना अक्स सरदार पटेल में ही ढूंढते रहे हैं. उन्हें सरदार पटेल से अपनी तुलना हमेशा एक सुखद अनुभूति देती रही है. भारतीय राजनीति के अपने स्वर्णिम दिनों में भी वे ऐसी परस्थितियां बनाने की जुगत में रहते कि उनकी तुलना सरदार पटेल से हो.

पर, वाजपेयी सरकार में जब-जब आंतरिक व घरेलू मोर्चो पर सरकार कमजोर दिखी, मीडिया वालों ने अपने खबरों व आलेखों में आडवाणी की खूब खबर ली. उपहास व व्यंग के साथ लौह पुरुष शब्द का उल्लेख कर आलेख व खबरें लिखे गये. यह भी दिलचस्प है कि वाजपेयी सरकार के पतन के बाद यूपीए सरकार बनने पर और चुनाव करीब आने पर आडवाणी शुभचिंतकों ने उनके लिए पीएम इन वेटिंग जैसा मजाकिया जुमला गढ़ा. यूपीए - 1 का कार्यकाल पूरा होने पर हुए आम चुनाव में आडवाणी ने डॉ मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री बता कर चुनाव प्रचार किया. आडवाणी का यह नारा चुनाव अभियान में उनका एक सूत्री कार्यक्रम बन गया था. वे अपने कार्यक्रम उतने प्रभावशाली तरीके से लोगों तक नहीं रख सके.परिणामत: डॉ सिंह ने आडवाणी को चुनाव में पटकनी दे दी.

पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2009 में आडवाणी के चुनाव प्रचार के तरीके से खुश नहीं था. संघ के गलियारे में चुनाव अभियान के बाद गुस्से व कोफ्त के साथ यह चर्चा होती रही कि आडवाणी डॉ सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री कह कर चुनाव प्रचार करते रहे और इन्हें ही डॉ मनमोहन सिंह ने पटकनी दे दी. दरअसल, इस प्रसंग का उल्लेख करना इस लेख के मूल विषय से विभ्रमित होना नहीं है.

बल्कि यह याद दिलाना है कि मोदी और उनके राजनीतिक गुरु आडवाणी में बारीक और अहम अंतर है. मोदी विरोधियों पर जितने तीखे हमले करते हैं, उससे भी कहीं अधिक मजबूती से अपने कार्यक्रम बताते हैं और उससे भी कहीं अधिक ढंग से उसको लेकर मन से संकल्पवान रहते हैं. सालों पहले गुजरात चुनाव के दौरान उनको दी गयी उपाधि मौत के सौदागर अब सपनों के सौदागर में रूपांतरित हो गयी और सपनों के इस सौदागर को देश की जनता व युवाओं ने हाथों-हाथ इसलिए लिया, क्योंकि इस शख्स ने सपनों को बड़े योजनाबद्ध तरीके से आमलोगों में बेचा.

अब जब मोदी ठोस बहुमत के साथ सत्ता में हैं तो वे संघ के एक प्रचारक के मुख्य स्वभाव यानी खामोशी से अपने उस सपने को सच करने की कोशिश में हैं, जिसके तहत वे कांग्रेसमुक्त भारत बनाना चाहते हैं. आप कांग्रेस की जगह नेहरू -गांधी परिवार शब्द को भी चस्पां कर इस पंक्ति को पढ़ और समझ सकते हैं. मोदी अपने सार्वजनिक संबोधनों से बार-बार यह संकेत देते रहे हैं कि वे नेहरू-गांधी परिवार को ही कांग्रेस का पर्यायवाची मानते हैं.

यानी वे एक ऐसा भारत बनाना चाहते हैं, जिसमें पिछले 67 सालों से कायम नेहरू -गांधी परिवार का राजनीतिक एकाधिकार खत्म हो जाये. मोदी देश की समस्याओं का कारण इस परिवार के एकाधिकार को बताते रहे हैं और वे इस परिवार के पहले पीडि़त और प्रतिरोध के सबसे सशक्त प्रतीक (आजाद भारत में) सरदार पटेल के व्यक्तित्व व कृतित्व की जड़ें देश की जनता विशेषकर युवा जन-मानस  के मन में गहरे जमाना चाहते हैं. मोदी चाहते हैं कि अबतक लोग जिस तरह से
पंडित नेहरू व इंदिरा गांधी से सर्वाधिक प्रभावित रहे हैं, उसी तरह आने वाली पीढि़यां सरदार पटेल से प्रभावित दिखें. युवाओं से बात करें और उसकाबारीक विश्लेषण करें तो आपको ऐसा होने का अहसास भी हो होगा. यह धारणा बहुत आम हो चली है कि सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते तो जम्मू कश्मीर की समस्या नहीं होती और देश की सूरत अलग होती और इसकी पहचान मौजूदा स्थिति से कहीं अधिक मजबूत व संपन्न राष्ट्र की होती.

मोदी सरकार के पहले बजट में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयालउपाध्याय, पंडित मदन मोहन मालवीय के नामों से योजनाएं हैं, लेकिन अबतक के ज्यादातर बजटों की तरह पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के नाम से योजनाएं नहीं हैं. एक मोटी गणना के अनुसार, देश में फिलहाल 450 से अधिक योजनाएं अकेले नेहरू-गांधी परिवार के नाम पर चल रही हैं. लोगों के लिए तो गिनना भी मुश्किल है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा गांधी और नाती राजीव गांधी के नाम पर किस-किस तरह की योजनाएं चल रही हैं.

उदाहरण के लिए राजीव गांधी के नाम पर राजीव गांधी पंचायत सशक्तीकरण अभियान शुरू किया गया है. यूपीए सरकार अगर चाहती तो इस अभियान को देश के पहले पंचायती राज मंत्री एसके राय के नाम पर शुरू कर सकती थी. पंचायती राज को लेकर उनका अहम योगदान रहा और मंत्री पद से हटने के बाद भी उन्होंने जीवन पर्यत पंचायत व्यवस्था के लिए ही काम किया. लेकिन कांग्रेस में चाटुकारिता की परंपरा इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी हैं कि उसके नेताओं को पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी व राजीव गांधी के अलावा किसी अन्य नेता के योगदान को सम्मान देने की सुध कभी नहीं रही.

सोनिया गांधी की कांग्रेस पार्टी के अधिकतर नेताओं के कमरे में आपको उनकी सास व पति (इंदिरा-राजीव) की तसवीरें अवश्य मिलेंगी. जबकि कांग्रेस में कई महान नेता हुए. अब आने वाले सालों में कांग्रेस नेताओं की इस कमी की भरपाई मोदी करेंगे, वे भी अपने ही अंदाज में. संभव है कि इसका असर कांग्रेस से ज्यादा नेहरू-गांधी
परिवार पर ही पड़ेगा. मोदी सरकार के पहले बजट में ही जिन तीन नेताओं के नाम पर नयी योजनाएं शुरू की गयी हैं, उसमें दो नेता - पंडित मदन मोहन मालवीय व डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी मूल रूप से कांग्रेसी रहे हैं. महामना मालवीय तो चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और महात्मा गांधी भी उनका गुरुतुल्य सम्मान करते
और उनसे मार्गदर्शन लेते. राष्ट्र निर्माण में उनका अमूल्य योगदान रहा है. काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे अद्वितीय शैक्षणिक संस्थान की उन्होंने स्थापना की, जिसने देश के हर क्षेत्र में कार्य करने के लिए श्रेष्ठ प्रतिभाएं तैयार की और राष्ट्र निर्माण को इससे दशकों तक गति मिलती रही. पर, आजादी के बाद कांग्रेस के हुए परिवारीकरण में उनकी न तो वैसी चर्चा हुई और न ही उन्हें वह सम्मान मिला, जिसके वे हकदार रहे.
इतिहास की पुस्तकों में उनका वैसा प्रभावी उल्लेख नहीं किया गया है. इस बात का दु:ख बुद्धिजीवी वर्ग के बहुत सारे लोगों को है. अब- जब मोदी महामना के शहर बनारस से सांसद चुन कर देश के प्रधानमंत्री बने हैं, तो वे अपने ही तरीके से इस मोर्चे पर कार्य करेंगे. पंडित मदन मोहन मालवीय नव अध्यापक प्रशक्षिण पाठ्यक्रम के माध्यम से वे देश की नयी पीढ़ी को नया पाठ पढ़ायेंगे.
http://goo.gl/tFkgbR

Friday, April 18, 2008

अभी अभी

दुनियa अगर नई है तों चहरा भी नया ho

Thursday, November 29, 2007

आज समाज
आज समाज
नई पहल, नई सोच
हिन्दी पत्रकारिता

Thursday, November 8, 2007


दीपावली पर दीपो कि माला सजी है, हर तरफ, हर जगह, आईये हम अपने दिलों में भी इस उजाले को जगह दें, एक नयी सुबह के लिए।

Tuesday, November 6, 2007



दीपावली की हर जगह धूम है, दीयों से सजी है ये दीपावली

पाकिस्तान में सब कुछ बदल गया है, नही बदला है तो यह रेत्रीत सेरिमोनी। बाघा बॉर्डर पर इसका एक सीन।